*महाराणा प्रताप *
ता राखे धर्म की ताहि राख करतार ,
इसी सोच से उठी मेवाड़ की तलवार ।
एकलिंग भी ले बैठे यहाँ पर अवतार ,
महाराणा के गुण गांवा में बारम्बार ।।
प्रथम नमन करता हुँ कुलदेवी बाण मात को ,
दुजा नमन करू मेवाड़ धणी एकलिंग नाथ को ।
आगे नमन करता हुँ हिंदुआ सूरज की जात को ,
जिन्होंने प्राणो से बढ़ कर माना अपनी बात को ।।
आजादी का दिवाना था वो राणा ,
मर मिटने को तत्पर था वो राणा ।
जंगल में रह कर भी सम्पन था वो राणा ,
घास की रोटी खाकर भी प्रसन्न था वो राणा ॥
मेवाड़ धरा पर गंगा की तेज धार था राणा ,
दुश्मन के लिए तेजधार तलवार था राणा ।
राजपूतो की बड़ी बड़ी भूलों का सुधार था राणा ,
इतिहास गवाह हे इस माटी पर अवतार था राणा ॥
विश्व को आजादी से जीने मरने का पाठ पढ़ा गया राणा ,
कष्ट सहे जंगल में रहे फिर भी आन बान बचा गया राणा ।
मातृ-भूमि हे सबसे प्यारी ये बात सभी को बता गया राणा ,
राजाओं का राजा था फिर भी घास की रोटी खा गया राणा ॥
राज तो सभी किया करते हे परंतु राज धर्म निभा गया राणा ,
मान सम्मान से जिया वो स्वाभिमान से जीना सिखा गया राणा ।
आजाद रहा वो आजादी का सही अर्थ सभी को बता गया राणा ,
यहाँ इस माटी के कण-कण को अपने खून से जोड़ गया राणा ॥
(कवि -सांवर मल जाट )
ता राखे धर्म की ताहि राख करतार ,
इसी सोच से उठी मेवाड़ की तलवार ।
एकलिंग भी ले बैठे यहाँ पर अवतार ,
महाराणा के गुण गांवा में बारम्बार ।।
प्रथम नमन करता हुँ कुलदेवी बाण मात को ,
दुजा नमन करू मेवाड़ धणी एकलिंग नाथ को ।
आगे नमन करता हुँ हिंदुआ सूरज की जात को ,
जिन्होंने प्राणो से बढ़ कर माना अपनी बात को ।।
आजादी का दिवाना था वो राणा ,
मर मिटने को तत्पर था वो राणा ।
जंगल में रह कर भी सम्पन था वो राणा ,
घास की रोटी खाकर भी प्रसन्न था वो राणा ॥
मेवाड़ धरा पर गंगा की तेज धार था राणा ,
दुश्मन के लिए तेजधार तलवार था राणा ।
राजपूतो की बड़ी बड़ी भूलों का सुधार था राणा ,
इतिहास गवाह हे इस माटी पर अवतार था राणा ॥
विश्व को आजादी से जीने मरने का पाठ पढ़ा गया राणा ,
कष्ट सहे जंगल में रहे फिर भी आन बान बचा गया राणा ।
मातृ-भूमि हे सबसे प्यारी ये बात सभी को बता गया राणा ,
राजाओं का राजा था फिर भी घास की रोटी खा गया राणा ॥
राज तो सभी किया करते हे परंतु राज धर्म निभा गया राणा ,
मान सम्मान से जिया वो स्वाभिमान से जीना सिखा गया राणा ।
आजाद रहा वो आजादी का सही अर्थ सभी को बता गया राणा ,
यहाँ इस माटी के कण-कण को अपने खून से जोड़ गया राणा ॥
(कवि -सांवर मल जाट )
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