* सावण *
बरस बावली रेता में , आणंद करदे खेता में
पहली-पहली बरखा वेगी , माटी की वा खुशबू आगि ॥
हळिया ले किसान चालिया , खेता में ही डेरा लांगिया
मूंग मक्की मुफलिया भादी , गलिया खेत ग्वार ज्वार की धोरा लागि ॥
धरती ने तु स्वर्ग बना दे , कृषाणा को मनडो हरसादे
बीज बचिया ने हाथा में
बरस बावली रेता में , आणंद करदे खेता में ॥
कांई दिना सुं भुखा बैठा , गाय-रोजड़ा की भूख मिटबा लागि
तितर-मोर विचरण लागिया , सांप-गोइरा दिखण लागिया ॥
सांप की छतरिया मोटी वेगि , सावण की डोकरिया फरबा लागि
पालर पाणी लाया घाघर में , नाड़ा-खोचरा भरगिया छापर में ॥
डूंगर सारा हरिया वेगिया , गारा -छाळि चरबा लागिया
डेडका बोलिया राता में ,
बरस बावली रेता में , आणंद करदे खेता में ॥
(कवि - सांवर मल जाट )
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