रविवार, 24 जुलाई 2016

                                                *  सावण  *



बरस बावली रेता में , आणंद करदे खेता में 
पहली-पहली बरखा वेगी , माटी की वा खुशबू आगि ॥ 


हळिया ले किसान चालिया , खेता में ही डेरा लांगिया 
मूंग मक्की मुफलिया भादी ,  गलिया खेत ग्वार ज्वार की धोरा लागि ॥ 


धरती ने तु स्वर्ग बना दे , कृषाणा को मनडो हरसादे
बीज बचिया ने हाथा में  
बरस बावली रेता में , आणंद करदे खेता में ॥   


कांई दिना सुं भुखा बैठा , गाय-रोजड़ा की भूख मिटबा लागि 
तितर-मोर विचरण लागिया , सांप-गोइरा दिखण लागिया ॥


सांप की छतरिया मोटी वेगि , सावण की डोकरिया फरबा लागि 
पालर पाणी लाया घाघर में , नाड़ा-खोचरा भरगिया छापर में ॥ 

डूंगर सारा हरिया वेगिया , गारा -छाळि  चरबा लागिया 
डेडका बोलिया राता में , 
बरस बावली रेता में , आणंद करदे खेता में ॥


(कवि - सांवर मल जाट )

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