सोमवार, 25 जुलाई 2016

                              
कहानी प्रेम की मौला, अक्सर छोटी क्यों बनाता है
जब तक समझते इसको , यह रिश्ता टूट जाता है । 
प्रेम तो पुजा है , इस जहाँ में मालुम हे हमको 
उस पुजा में विघ्न आखिर हर बार क्यों आता है ॥ 

(सन्नाटा )
                                             * गजल *

अपने  प्यार को तो मोला , सभी भगवान बताते हैं 
पूजते हे तब तक , जब तक ना धोखा खाते हैं 
 शिचते हैं वो दिपक खून से अपनी मोहबत का  
ऐसे दिवाने अक्षर हार कर भी जीत जाते हैं ॥ 

(कवि -सन्नाटा )
                                           * ऐ मेरे दिलदार *



ऐ मेरे दिलदार बता दे , क्या मुझसे प्यार नहीं 
दूर क्यों मुझसे इतना तु , क्या में तेरा यार नहीं 
ऐ मेरे दिलदार बता दे , क्या मुझसे प्यार नहीं ॥ 


झुठी थी तेरी सारी कसमें , क्या वो वादे याद नहीं 
रब से बढ़कर माना तुझको , क्या वो बातें याद नहीं
क्यों किया था इकरार , जो तेरे दिल में था प्यार नहीं                        
ऐ मेरे दिलदार बता दे , क्या मुझसे प्यार नहीं ॥ 


मोहबत का शीश महल था मेरा , जिसको तु तोड़ गई 
दिल भी तोड़ दिया तुने , मुझको अकेला छोड़ गई 
प्यार किया था मैंने तुझसे , कोई व्यापार नहीं 
ऐ मेरे दिलदार बता दे , क्या मुझसे प्यार नहीं 
दूर क्यों मुझसे इतना तु , क्या में तेरा यार नहीं ॥ 

(कवि - सांवर सन्नाटा )