शनिवार, 23 जुलाई 2016

                                                             * काश्मीर की पुकार *


काश्मीर जो धरती का स्वर्ग दिखाई देता था 
भारत माँ के सर का ताज दिखाई देता  था ,
खो गया है आज वो अपनी ही फूलों की घाटी में 
दुश्मन लात मार रहा हे भारत माँ की छाती में  ।।


47 के बटवारे ने 65 की आग में झोंक दिया 
71 की लड़ाई ने भी कारगिल को फूँक दिया ,
दिल्ली फिर भी कुम्भकरण की शैय्या पर सोई हे ,
देख दिल्ली की नाकामी धरती मैय्या रोई हे  ।।


क्यों शिमला समझौते को बार - बार दोहराते हो 
एक बार क्यों नहीं नया कोहराम करवाते हो , 
बहुत सह लिया अब एक संग्राम हो जाने दो 
उस नापाक को उसकी ओकात बताने दो   ।।


शहीदों के बच्चों की किलकारी सुनाई देती हे घरों में 
कितने ही शिमला जैसे समझौते जलते हे बारूदों के ढेरों में ,
आखिर दिल्ली का यह संयम क्यों नहीं टूट रहा 
सब्र का प्याला कब भरेगा जो पेंदे से फूट रहा  ।। 


(कवि - सांवर मल जाट )

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